चार प्रकार के पुरूषार्थ

ॐ स्वस्ति अस्तु

 

 हम  अपने जीवन में चार प्रकार के पुरूषार्थ करते हैं. यह पुरूषार्थ हमारे सामर्थ्य हैं जिनको चार भागों में बाँटा जा सकता है धर्म अर्थ काम और मोक्ष.  हमारे जीवन में यह चारों पुरुषार्थ उम्र के अलग-अलग भागों में प्रधान होती है जैसे शुरुआती 20 से 25 वर्ष हम धर्म पुरुषार्थ के प्रति ज्यादा सामर्थ्यवान होते हैं उसी प्रकार अगले 20 से 25 वर्ष की उम्र जो युवा काल है उसमें हम अर्थ पुरुषार्थ करते हैं. 45 – 50 साल के पश्चात अगली 20 – 25 वर्ष हम काम पुरुषार्थ के योग्य होते हैं और अंततः साथ 65 वर्ष के पश्चात हमें मोक्ष पुरुषार्थ के लिए अग्रसर होना चाहिए. इन चारों उम्र के पड़ाव में हम अलग-अलग सामर्थ्य और  पुरुषार्थ का अनुपालन करते हैं. इसी प्रकार चार प्रकार की आश्रम सनातन संस्कृति के मूल आधार है ब्रह्मचर्य आश्रम गृहस्थाश्रम वानप्रस्थाश्रम और सन्यास आश्रम. यह आश्रम क्रमशः इन चारों पुरुषार्थों के साथ सम्मिलित रूप से संयुक्त रहता है . इसी प्रकार चार प्रकार के  ऋण होते हैं-  ऋषि, पितृ, देव और  ब्रह्म  ऋण.  इन सभी का वर्णन वेद के चार संभाग में निहित है जो इस प्रकार से हैं- संहिता ब्राह्मण आरण्यक और उपनिषद.

धर्म पुरुषार्थ

मनुष्य जीवन के शुरुआती 20 – 25 वर्ष जब हम परिवार, समाज और  संसार मे बने रहने और उसमें स्वयं को व्यवस्थित करने हेतु सामान्य समझ, विद्या, कौशल, ज्ञान और विज्ञान को अपने भीतर समावेश करते हैं, तभी उसे हम धर्म कहते हैं – धारयति जनरेती धर्मः. हम परिवार में और समाज में भांति भांति प्रकार के ज्ञान और उससे संबंधित कर्मो को समझते हैं.  स्कूल-कॉलेजों में विशेष ज्ञान अर्जित करके जीविकोपार्जन योग्य बनते हैं. धर्म पुरूषार्थ को धारण करने की समस्त उपाय और श्रेष्ठतम व्यवस्था को ब्रह्मचर्य आश्रम कहते हैं.  ब्रह्म का अर्थ  है – श्रेष्ठ और विस्तार.  अतः ब्रह्मचर्य का अर्थ श्रेष्ठ चर्या का विस्तार. इसे हम ब्रह्मा के अनुरूप दिनचर्या भी कह सकते हैं. ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्यार्थी जगत प्रपंच एवं  काम  वासनाओं से निर्लिप्त होकर श्रेष्ठतम दिनचर्या को धारण करता है,ताकि अपने भविष्य को सर्वश्रेष्ठ बनाया जा सके. यह सारी व्यवस्था वैदिक ऋषि यों ने  परंपरागत रूप से मानव जाति को उपलब्ध कराया अतः हम उन  ऋषि यों के ऋणी है.  धर्म पुरुषार्थ द्वारा हम न केवल ब्रह्मचर्य आश्रम की अवधारणा को परिपूर्ण करते हैं अपितु कृषि ऋण से भी मुक्त होते हैं.  वेदों के प्रथम अंग को संहिता कहते हैं. इन संहिताओं में समस्त ज्ञान विज्ञान के उच्चतम स्तर का स्पर्श है इसलिए इन्हें अपौरुषेय कहा जाता है. ब्रह्मचर्य अवस्था में इन अपौरुषेय ज्ञान-विज्ञान को आत्मसात कर विद्यार्थी धर्म पुरुषार्थ द्वारा ऋषि ऋण से मुक्त होता है. 

 

अर्थ पुरुषार्थ

 ब्रह्मचर्य आश्रम के पश्चात मनुष्य अगले आश्रम को अग्रेषित होता है जिसे हम गृहस्थाश्रम कहते हैं.  विवाहोपरांत अनेक प्रकार की जिम्मेदारियां, कर्म कर्तव्य तथा जीविकोपार्जन हेतु स्वयं को प्रस्तुत करना होता है.ब्रह्मचर्य आश्रम में जिस प्रकार की भी शिक्षा दीक्षा तथा ज्ञान प्राप्त हुआ है उसका प्रयोग हम गृहस्थ आश्रम में करते हैं.  संहिताओं का ज्ञान जीवन के विविध कर्म कर्तव्यों में, परिवार  के पोषण में  एवं समाज  के उत्थान में संपूर्ण रूप से उपयोग होता है.  गृहस्थ आश्रम में हम उस विज्ञान के अर्थ को प्रयोग में लाते हैं जो हमने ब्रह्मचर्य आश्रम में सीखी थी.ज्ञान का महत्व एवं अर्थ तभी है जब हम गृहस्थ आश्रम को धर्म के अनुरूप ही जीते हैं.  इसलिए इसे अर्थ पुरुषार्थ कहा जाता है.  हमारे पूर्वजों – पितरों प्रेम और ममता के कारण अनेक प्रकार के वसियत और विरासत  हमारी उत्तम जीवन के लिए छोड़ जाते हैं. इसे  पितृ ऋण कहा जाता है . जब हम धर्म और ज्ञान से इस वसीयत और विरासत का संरक्षण और संवर्धन करते हैं तब हम पितृ ऋण से मुक्त हो पाते हैं. गृहस्थ आश्रम में हम एक भाई, पिता, पति इत्यादि या घर का मुखिया बनकर अपने पूर्वजों के ऋण को चुकता करते हैं उसी प्रकार स्त्रियां अपने परिवार का पालन, पोषण, संतुलन, संरक्षण और प्रबंधन करके अपने पूर्वजों के ऋण को चुकाती है. वेदों के द्वितीय अंग को ब्राह्मण कहते हैं. ब्राह्मण संहिता के ज्ञान का कर्मकांडी स्वरूप है. गृहस्थ आश्रम में हम कर्मकांडों का सहयोग लेकर अपने कर्तव्यों को पूर्ण करते हैं तथा पितृ ऋण से मुक्त होते हैं.

 

काम पुरुषार्थ

गृहस्थाश्रम के पश्चात् प्रौढ़ अवस्था में हमें काम पुरुषार्थ के लिए अग्रेषित होना चाहिए.  जीविकोपार्जन के चुनौतियों एवं वसियत और विरासत उपयुक्त वंशज को सौंप कर हमें वानप्रस्थ आश्रम के लिए तैयार हो जाना चाहिए. जिस प्रकार युवावस्था में हम गृहस्थ धर्म की चुनौतियों के लिए  शक्तिशाली होते हैं उसी प्रकार अपनी कामना की संपूर्णता के लिए प्रौढ़ अवस्था में सामर्थ्य शाली होते हैं. अब तक की जीवन में हमने कई कामनायें इच्छाएं  जो किसी न किसी रुप से अपूर्ण रह गई हो या अवचेतन मस्तिष्क में समा गई हो,  उसकी संपूर्णता हेतु एवं चित्त शुद्धि के लिए काम पुरुषार्थ अनिवार्य है. कामना की संपूर्णता उसके पूर्ण होने में नहीं बल्कि कामना की अपनी प्रकृति में विलीन होने से है.  प्रत्येक इच्छाएं और कामनाए हमारे संस्कार बीज से उत्पन्न होते हैं.  न केवल इस जन्म के बल्कि पिछले अनेक जीवन के संस्कार बीज रुप में हमारे क्षेत्र में विद्यमान रहते हैं. इच्छाएं और कामनाएं अपनी संपूर्णता में तभी प्राप्त करते हैं जब चित्त बीज रूपी संस्कार को निरोध कर आनंद को प्राप्त होता है. इस आनंद को प्राप्त करने के लिए हमें वानप्रस्थ आश्रम को प्रस्थान करना पड़ता है.  वानप्रस्थ का शाब्दिक अर्थ जंगल अथवा अरण्य है. यहां जंगल अथवा अरण्य  में वास करना इस बात का प्रतीक है कि हम परिवार और समाज से अलग एकाकी जीवन को अपनाएं. इस एकांतवास के लिए चाहे जंगल में रहना पड़े या यायावरी करना पड़े वानप्रस्थ में हम अपने चित् को आनंद की स्थिति में लाने का हर संभव प्रयास काम पुरुषार्थ द्वारा करते हैं. वानप्रस्थ एवं यायावरी का एक और व्याख्या प्रकृति की समीपता और सानिध्य से है.  प्रकृति अर्थात् पंचमहाभूत आदि देवतागण. प्रकृति के संचालन हेतु समस्त देवतागण अपना योगदान करते हैं.  देवों के इस योगदान से प्रकृति संतुलित एवं रहने योग्य होती है.  हम इन देवताओं के प्रति ऋणी है क्योंकि इन्होंने प्रकृति जैसी श्रेष्ठ व्यवस्था हमें दी.  वानप्रस्थ अवस्था में हम चित्त शुद्धि द्वारा न सिर्फ स्वयं को संतुलित करते हैं अपितु समस्त प्रकृति में भी संतुलन लाते हैं. काम पुरुषार्थ द्वारा जब हम इच्छारहित और निष्काम हो जाते हैं तब हमारी परिपूर्ण चेतना प्रकृतिजन्य संवेदनाएं के प्रति सजग हो जाता है और इनमें निहित देवताओं की उपासना और आराधना हम शुद्ध चित् से कर पाते हैं. वानप्रस्थ द्वारा हम देव ऋण से मुक्त होते हैं. वेदों के तृतीय अंग  को आरण्यक कहते हैं.  संहिता और ब्राह्मण के पश्चात इनसे उपजे ज्ञान और कर्मकांड को हम अरण्य में अथवा एकांत में मनन और निदिध्यासन करते हैं. वेद के इस भाग में इन्हीं मनन और शोध का वर्णन है.

 

मोक्ष पुरुषार्थ

अंतिम सामर्थ्य मोक्ष पुरूषार्थ है. मोक्ष का अर्थ है आवागमन से मुक्ति,  समाधि अथवा कैवल्य.  जब चेतना पुरुष तत्व में विलीन हो जाए, प्रकृति अपने गुणों में विलीन हो जाए. ऐसी अवस्था जिसमें सत, चित, आनंद की अनुभूति हो, स्व-स्वरूप में अवस्थित हो जाए ऐसे आत्म-साक्षात्कार को मोक्ष कहते हैं. मोक्ष पुरुषार्थ के लिए हमें सन्यास आश्रम में प्रवेश करना होगा जो जीवन के अंतिम चौथाई भाग में संभव है.  काम पुरुषार्थ संपूर्ण होने पर हमें मुमुक्षु तत्व की प्राप्ति होती है. मुमुक्षा अवस्था में हम मोक्ष के लिए प्रयास करते हैं तथा  सन्यासी धर्म का पालन करते हैं. संन्यासी धर्म पूर्ण निर्लिप्त अवस्था है सभी प्रकार के मोह माया इत्यादि से मुक्त.  ब्रह्म के इस लीला में सन्यासी बन कर हम समाज को दिशा प्रदान करते हैं. ब्रह्मा अपनी लीला से माया और जगत की सृष्टि करते हैं ताकि हम इस का आनंद ले सके परंतु अविद्या के कारण हम अनेकानेक बंधनों में पड़ जाते हैं. मोक्ष द्वारा सभी बंधनों से मुक्त होकर हम ब्रह्म के इस माया को समझ पाते हैं और लीला का आनंद ले पाते हैं. ब्रह्म की लीला हम जीव को ऋणी बनाते हैं तथा  मोक्ष उपरांत ऋतंभरा प्रज्ञा से संसार को  दिशा और मार्ग दिखा कर हम  ऋण चुकाते हैं. इस प्रकार हम ब्रह्म ऋण से मुक्त होते हैं. वेदों के अंतिम भाग को उपनिषद कहते हैं.  अरण्य मैं निदिध्यासन द्वारा हम मोक्ष पद को प्राप्त होते हैं.  मुक्त जीव करुणा द्वारा संसार को मार्ग दिखाता है जिसे उपनिषद कहा जाता है. उपनिषद को वेदांत भी कहते हैं एवं सन्यासियों के लिए यह अनिवार्य है. मोक्ष प्राप्त सन्यासी गुरु बनकर उपनिषद की व्याख्या करते हैं.